गुरुवार, 22 अक्टूबर 2015

Diwan Ainuddin or Datia ka Jan Aandolan

                       दीवान ऐनउद्दीन और दतिया का जन आंदोलन   

                                                                                                                     - सोम त्रिपाठी
                        दतिया का जन आंदोलन १९४६ आज इतिहास के हाशिए   पर चला गया है। किन्तु एक समय  था, जब पूरे देश में इसकी चर्चा थी।   कांग्रेस के   मेरठ अधिवेशन १९४६ में यह चर्चा का विषय बना हुआ था। २८ नवंबर १९४६ के दैनिक सैनिक के अंक में "दतिया एक मिसाल है"  के शीर्षक में लिखा था कि  पं. जवाहर लाल नेहरू और सरदार वल्लभ  भाई पटेल ने यह बताया था कि "ब्रिटिश साम्राज्यशाही की वफादार नौकरशाही और मुस्लिम लीग हम-प्याला और हम-निबाला हैं...... इसकी सबसे ताजा मिसाल दतिया राज्य की घटना है।" वास्तव में कांग्रेस का असहयोग आंदोलन इतना  सफल नहीं हुआ था, जितना कि दतिया का जन आंदोलन। इस आंदोलन में स्टेट  के पूरे व्यवसाइयों ने अपने प्रतिष्ठान बंद रखे, स्टेट के सारे कर्मचारियों ने अपने त्यागपत्र दिये  और पूरी जनता  जिसमें महिलाएं और बच्चे  भी शामिल थे, ने क्राउन पुलिस की लाठियां खायीं और गिरफ्तारियां दीं थीं। इतना सब होने के बाद भी आंदोलन पूरी तरह अहिंसक और अनुशासित रहा। लोगों को आश्चर्य था कि आंदोलन की इतनी परिपूर्ण व्यवस्था की तैयारी कब कैसे और किसके द्वारा की गई ? यह  पूर्ण रूप से जनता के लिए, जनता द्वारा संचालित था। आंदोलन में महत्वपूर्ण भूमिका अदा करने वाले  प्रेमनारायण सिलारपुरिया जी ने कहा है  कि "आंदोलन क्यों हुआ  और उससे क्या उपलब्धि हुई ये दोनों बातें इतनी महत्वपूर्ण नहीं हैं कि उन पर विशेष प्रकाश डाला जावे।" जबकि  कारण  मुख्य है, आंदोलन तो मात्र उसकी प्रतिक्रिया थी।  आंदोलन के कुशल संचालन  का भी अपना एक महत्त्व है  जिसकी वजह से उपलब्धि प्राप्त हुई।
                       ऐनुद्दीन बगदादी का लघु संस्करण था, उसका उद्देश्य दतिया रियासत को इस्लामिक स्टेट बनाना था। दतिया का अभूतपूर्व आंदोलन ही था  जिसमें हिन्दू और मुसलमान दोनों ने कंधे से कन्धा मिला कर भाग लिया जिसके कारण ऐनुद्दीन अपने उद्देश्य में सफल नहीं हो सका।
                  १९४१ में दतिया के राजा गोबिन्द सिंह  के करीबी रघुनाथ सिंह भ्रष्टाचार के आरोपी थे।  उन्हें बचाने के लिए राजा ने  पोलिटिकल एजेंट की सलाह के बिना रियासत के दीवान हशमत अली को हटा कर  उसकी जगह काउन्सिल के एक स्थानीय सदस्य की   नियुक्ति कर दी थी। इसकी  जानकारी पोलिटिकल  एजेंट मेजर हेनरी पौल्टोन को मिली तो वह  दतिया आया  और उसने  राजा को समझाया कि उसकी  पूर्व सहमति के बिना  किसी भी तरह का बदलाव नहीं किया जा सकता। लेकिन महाराजा ने अली  को बहाल करने से साफ़ मना कर  दिया। इसके बाद रेजिडेंट फिशर ने गोबिन्द सिंह को मुलाकात करने को कहा, लेकिन गोबिंद सिंह ने  अपने पुत्र की बीमारी का बहाना बनाकर मिलने से मना  कर दिया। फलस्वरूप फिशर ने स्टेट के वित्तीय मामलों का ऑडिट एवं ब्रिटिश प्रतिनिधि की सलाह न मानने की सिफारिश  कर दी। सितम्बर १९४१ के  अंत में मजबूर होकर महाराजा को  पौल्टोन से समझौता  करना पड़ा। समझौते के  अनुसार वह ४ अवांछनीयों को सेवा से हटा देंगे और अली की जगह जिसे पोलिटिकल अथॉरिटीज सुनिश्चित करेगी, अस्थाई रूप से नियुक्त कर देंगे । २९ सितम्बर को अली की जगह राव बहादुर लेले दीवान बनकर दतिया आये। एक सप्ताह के बाद पौल्टोन  को मालूम हुआ कि ४ अवाँछनीयों को निकालने का आदेश तो पारित हो गया था, लेकिन उन्होंने न तो चार्ज दिया और न ही दतिया छोड़ी। इसके अलावा लेले को ३० सितम्बर  से ४ अक्टूबर  तक सेवा में ही नहीं लिया।
                   दुर्भाग्य   से १ अक्टूबर १९४१ को दशहरे के अवसर पर आयोजित समारोह में महाराजा की अक्षमता का प्रकरण घटित हो गया। जब गोबिन्द सिंह और उनके मेहमानों ने अत्यधिक मदिरा पान कर सार्वजनिक रूप से ध्रांगधा  एवं झालावाड़ के महाराजाओं को  शर्मनाक तरीके से अपमानित किया और शाम को आयोजित दरबार में सुपरिंटेंडेंट  आफ पुलिस को खुलकर गालियां दी। फलस्वरूप फिशर ने फिर से नई  सिफारिशें की, जिसे ब्रिटिश सरकार ने स्वीकार कर लिया। उसके अनुसार गोबिंद सिंह से लिखित में पूछा जाये कि - एक नए दीवान की नियुक्ति की जायेगी जो राज्य के प्रशासन का संचालन करेगा (यद्यपि महाराजा को महल और शिकार के प्रबंधन में कुछ अधिकार होंगे) महाराजा को अलग से बुराईयों की एक सूची को स्वीकारनी  पडेगी। महाराजा दीवान को आदेश नहीं दे सकेंगे, लेकिन वे रेजिडेंट और पोलिटिकल एजेंट को राज्य के मामलों के बारे में सूचित और परामर्श कर सकेंगे। इन शर्तों को गुप्त रखा जायेगा ताकि जनता का कोई हस्तक्षेप न हो। यदि गोबिंद सिंह इसके लिए तैयार नहीं हुए तो उनकी राज्य करने की क्षमता का आंकलन करने के लिए एक आयोग का गठन किया जाएगा। इन संशोधित शर्तों को गोबिंद सिंह ने १५ नवंबर १९४१ को लिखित में स्वीकार कर लिया।
                   इतना सब कुछ हो जाने के बाद भी दीवान और गोबिंद सिंह का टकराव ख़त्म नहीं हुआ। जनवरी १९४२ में  लेले की जगह नए दीवान देवी सिंह आये।  उनसे भी टकराव हुआ तो अंत में फिशर को प्रतिवेदन देना पड़ा कि - " the pulse of the Datia State is beating very feebly at present, and it is thought that His Excellency`s recent decision to take over control of this Administration has come at a most opportune time" तमाम विचार-विमर्श के बाद ब्रिटिश सरकार ने यह निर्णय लिया कि  देवी सिंह की जगह एक शक्तिशाली दीवान की नियुक्ति की जाये जो महाराजा पर नियंत्रण रख सके। अंग्रेजों की दृष्टि में इस तरह का सबसे उपयुक्त दीवान ऐनुद्दीन था। ऐनुद्दीन जब  कांकोरी-ट्रैन-डकैती केस का  स्पेशल जज था, तब उसने सी.आई.डी. के डिप्टी एस.पी. खान बहादुर तसद्दुक हुसैन से मिलकर केस को  इतना उभारा कि उसमें रामप्रसाद बिस्मिल, अश्फ़ाक़उल्ला खान सहित ४ को फांसी, २ को कालापानी, शेष १६ व्यक्तियों  को ३ साल से लेकर १४ वर्ष की सजाएँ हुईं थीं। और जब वह चरखारी का दीवान बना तब उसने वहां के राजा को पद्च्युक्त करा दिया था। इसके आलावा  उसने कांकोरी प्रकरण में मुसलमान होने के नाते अश्फ़ाक़उल्ला को फांसी से बचाने के लिए अपना एक आदमी उसे  सरकारी गवाह बनाने के लिए भेजा।  लेकिन अश्फ़ाक़उल्लाह ने  सरकारी गवाह बनने   से इंकार कर दिया और कहा  कि "कम से कम एक मुसलमान को तो अपनी मातृभूमि पर शहीद हो जाने दो।"
                     इसका कारण कुछ भी हो लेकिन ऐनुद्दीन के दतिया आने पर गोबिन्द सिंह अपना अधिकांश समय सेंवड़ा में व्यतीत करने लगे थे। इस स्थिति का लाभ उठाकर ऐनुद्दीन ढाई साल तक अपनी मनमानी करता रहा। उसने अपने बरिष्ठ अंग्रेज अधिकारी  रेजिडेंट, पोलिटिकल एजेंट आदि को अपनी वाकपटुता से प्रभावित  कर लिया और  प्रशासन पर अपनी पकड़ मजबूत करने के लिए  रियासत के  डिस्ट्रिक मजिस्ट्रेट, सिटी मजिस्ट्रेट, चीफ रेवेन्यू ऑफीसर, कस्टम सुपरिंडेंट, आदि प्रमुख पदों पर अपने सजातीयों को बाहर  से बुलाकर नियुक्त कर दिया।
                ऐनुद्दीन ने नगर के कुछ कट्टरपंधी मुसलमानों का एक गुट बनाकर अंजुमने-इस्लामियां नाम का एक सांप्रदायिक संगठन खड़ा किया । इस संगठन के माध्यम से मुसलमानों में कट्टरता का प्रसार और  दलित  हिन्दुओं, का धर्म परिवर्तन कराने की योजना बनाई। किन्तु अम्बेडकर की विचारधारा  को मानने वाले दलित हिन्दू धर्म परिवर्तन के खिलाफ थे, इसीलिए उसकी यह योजना सफल नहीं हो पाई।  फिर भी वह  भटियारा मोहल्ला दतिया के खटीकों का धर्मांतरण करने में  सफल हो गया ।  (इसकी सूची १९५१ की दतिया नगर  की  वोटर लिस्ट में देखी  जा सकती  हैं, जिसमें मतदाता के नाम तो मुसलमानी हैं किन्तु उनके पिता के नाम हिन्दू  अंकित हैं।)
               आतंक स्थापित करने के लिए  ऐनुद्दीन ने विकास के नाम पर दतिया नगर का  एक ऐसा मास्टर प्लान तैयार कराया जिसमें उसने एक ओर तो मस्जिदों और मजारों का निर्माण  तो दूसरी ओर हिन्दुओं के मकानों,  दुकानों के आलावा बड़ी संख्या में मंदिरों को तुड़वा दिया। यहाँ यह बात ध्यान देने वाली है कि पीढ़ियों से रियासत में हिन्दू  और मुसलमान  इस तरह मिल-जुल कर रह रहे थे कि मानो रियासत में चार वर्ण न होकर पांच वर्ण हों। सब एक दूसरे के तीज-त्योहारों को  बड़े उत्साह के साथ मनाते थे, उनमें भेदभाव का कोई भाव नहीं था। लेकिन  जब ऐनुद्दीन ने मंदिरों को तुड़वाया तब हिन्दू और मुसलमान दोनों को बुरा लगा, क्योकि यह उनकी परम्परा के खिलाफ था,  लेकिन वे वेवस थे।
               विश्व युद्ध समाप्त हो जाने के बाद १९४५ में ब्रिटेन में लेबर पार्टी की सरकार बनी। यह सरकार भारतीय स्वतंत्रता की पक्ष में थी। उसने १९४६ में प्रांतीय विधान मंडलों के चुनाव कराये। इसी क्रम में देशी राजाओ पर लगे प्रतिबन्ध भी  हटा लिये।  फलस्वरूप मार्च १९४६ में अंग्रेजों ने महाराजा गोबिन्द सिंह की शक्तियों पर लगे प्रतिबंधों को उठा लिया था।
                १६ अगस्त १९४६ को मुस्लिम लीग ने  प्रत्यक्ष कार्यवाही दिवस का आह्वान किया। दतिया  में   इसका प्रभाव पड़ा और अंजुमने-इस्लामियां ने एक आमसभा का आयोजन किया और उसमें  हिन्दुओं की धार्मिक भावनाओं को आहत करते हुए खुलकर गालियां दी।
                  दतिया की जनता ने सत्ताधारियों के अत्याचारों को हमेशा सहा है, कभी विरोध  नहीं किया, लेकिन लार्ड रीडिंग हाई स्कूल के प्रधानाध्यापक केसवराव रामचन्द्र चिकटे यह सहन नहीं सके।  और उन्होंने दतिया के इतिहास में पहली बार ऐनुद्दीन की  मनमानी का सार्वजनिक रूप से  विरोध करने का  निर्णय  लिया। उन्होंने  अपने शिष्य  रामरतन तिवारी, भैयालाल व्यास आदि को आंदोलनं करने का निर्देश दिया। नगर में एक विशाल आमसभा हुई जिसमें ऐनुद्दीन के कारनामों का विरोध करते हुए  हिन्दू-मुसलमान, दलित- सामान्य सभी की एकता पर बल देते हुए शांति और अहिंसा के साथ आंदोलन करने का आह्वान किया।
                            इसी बीच  ६ से ८ अक्टूबर १९४६ को प्रजा मण्डल की ओर से एक त्रिदिवसीय अधिवेशन हुआ,  जिसमें बाहर से आये पंडित परमानंद, स्वामी स्वराज्यानन्द, भरतपुर के मौलवी अहमद, आगरा के गोपाल नारायण शिरोमणि, लालाराम बाजपेई आदि नेताओं ने उत्तरदायी शासन की मांग करते हुए ऐनुद्दीन के कारनामों की आलोचना की।
                               २४ अक्टूबर से २६ अक्टूबर १९४६ तक  मड़िया के महादेव व  नगर के कई मंदिरों की मूर्तियों को तोड़ा  तथा अपमानित किया गया। इन सारी  घटाओं का सूत्रधार ऐनुद्दीन ही था। उसका उद्देश्य हिन्दू मुसलमानों के बीच दंगा कराना था, लेकिन वह अपने उद्देश्य में सफल नहीं हो पाया।  इसके विपरीत दतिया के हिन्दू और मुसलमान  उसके विरोध में एक साथ खड़े हो गए। यह स्थिति ऐनुद्दीन  के लिए अप्रत्याशित थी, वह स्वयं कटघरे में खड़ा हो गया था। इसीलिये उसने अपने वचाव के लिए सारा दोष हिन्दुओं पर मढ़ते हुए रेजिडेंट को अपना त्यागपत्र भेज दिया। साथ में  रेजिडेंट और पोलिटिकल एजेंट को यह विश्वास दिलाने में भी सफल हो गया कि दतिया में मूर्तियों की तोड़फोड़ आदि घटनाएँ  उसके खिलाफ हिन्दुओं के द्वारा रचा गया एक षड्यंत्र था। इसीलिए ब्रिटिश सरकार ने उसका त्यागपत्र अस्वीकार करते हुए महाराजा गोबिंद सिंह को धमकी देकर आंदोलनकारियों पर सबसे कड़ी कार्यवाही करने तथा ऐनुद्दीन की रक्षा करने का भार सौंप दिया।
                     अभी तक चिकटे साहब परोक्ष रूप अपने शिष्यों को अहिंसक, और  शांति पूर्वक आंदोलन चलाने के निर्देश देते रहते थे, किन्तु अब  परिस्थितियां गंभीर हो गईं थीं। इसीलिए उन्होंने आंदोलन में सक्रिय भाग लेने का निर्णय लिया और मड़िया के महादेव पर अनशन पर बैठ गए। चिकटे साहब के अनशन पर बैठते ही नगर में बाजार बंद हो गया और नगर के सारे  मजदूरों ने आंदोलन के समर्थन में  अपना काम बंद कर हड़ताल कर दी। हड़ताल की सूचना पाकर नौगांव से पोलिटिकल एजेंट विलियम एगर्टों  दतिया आया। ५ नवंबर को महंत दशरथिदास के नेतृत्व में एक प्रतिनिधि मंडल पोलिटिकल एजेंट से  मिला और उनके सामने अपनी बात रखी। लेकिन एजेंट ने  बात को टालने के उद्देश्य से किसी भी तरह का  निर्णय नहीं लिया।
                  आंदोलन को व्यवस्थित रूप से चलाने के लिए ६ नवंबर को महंत दशरथिदास के मंदिर में दतिया पीपुल्स पार्टी का गठन हुआ। शाम को महाराजा ने पीपुल्स पार्टी के प्रतिनिधियों को बुलाया और  अपनी परिस्थिति से अवगत करते हुए सहायता करने में अपनी असमर्थता व्यक्त की। बाद में चिकटे साहब ने क़िले के सामने  एक आमसभा की और उसमें अपने त्यागपत्र की घोषणा कर दी। चिकटे साहब के त्यागपत्र देते ही उनके समर्थकों  ने रियासत की नौकरियों से स्तीफा देना शुरू कर दिया। त्यागपत्र देने का यह क्रम  तीन दिनों  तक लगातार चलता रहा। कर्मचारियों के त्यागपत्र देने के कारण प्रशासन बिलकुल  ठप्प हो गया।   इस घटना से पोलिटिकल एजेंट क्रोधित हो गया और उसने क्राउन पुलिस बुलबा  ली। लेकिन स्थिति में कोई सुधार नहीं हुआ तो  निराश होकर वह  ७ नवंबर को छुट्टी पर चला गया। पोलिटिकल एजेंट की अनुपस्थिती  में महाराजा ने  क्राउन पुलिस को नगर के बाहर भेज दिया और आंदोलनकारियों को समस्या के शीघ्र समाधान का आश्वासन देकर, हड़ताल समाप्त करवा  दी।
                महाराजा द्वारा  ऐनुद्दीन को  निकाल देने का  आश्वासन तथा क्राउन पुलिस को नगर के बहार भेज देने के   आदेश को   ऐनुद्दीन ने अपनी प्रतिष्ठा का प्रश्न बना लिया और  इसी बात पर उसने अपना   त्याग पत्र  कैम्पबेल को भेजकर, उनसे  शीघ्र दतिया आने का अनुरोध किया।
               ११ नवंबर को कैम्पबेल दतिया आया और उसने महाराजा को अपना व्यान देने को कहा। गोबिंद सिंह ने हर आरोप को नकारते हुए कहा कि दीवान के प्रशासन में उन्होंने कोई हस्तक्षेप नहीं किया है, जो विरोध हुआ वह "बदमाशों" का काम है। कैम्पबेल ने गोबिंद सिंह के कथन को नकारते हुए पूर्व की तरह उनके अधिकार प्रतिबंधित करने की अनुशंसा कर दी। रेजिडेंट ने स्थिति को नियंत्रित करने के लिए  ८ नवंबर के महाराजा के आदेश को निरस्त करते हुए पीपुल्स  पार्टी के सभी नेताओं को गिरफ्तार कर नगर में १४४ धारा लगा दी।  क्राउन पुलिस के दो और दस्ता भेजने का अनुरोध किया तथा  ऐनुद्दीन का त्याग  पत्र स्वीकार करते हुए अग्रिम व्यवस्था होने तक के लिए  उसे  दो महीने और रुकने के लिए राजी किया।
                 १२ नवंबर को नेताओं की गिरफ्तारी के विरोध में गंज के प्रांगण में एक विशाल आमसभा का आयोजन हुआ। महंत दशरथिदास, किशोरीशरण चौदा आदि नेताओं के जोशीले भाषण हो रहे थे कि अचानक क्राउन पुलिस ने बिना चेतावनी के लाठीचार्ज कर दिया। गंज की स्थिति लगभग जलियाँ  वाले बाग़ की तरह थी।  जमकर लाठियां बरसाई गई जो लोग भागे उन्हें दरवाजे के बाहर  खड़ी बसों में भरकर १५ मील दूर जंगल में छुड़वा दिया, इसमें ८-१० साल के बच्चे भी शमिल थे। इस घटना का असर पुरुषों की अपेक्षा महिलाओं पर अधिक हुआ। १३ नवंबर को नगर की महिलाओं का एक विशाल जलूस १४४ धरा तोड़कर दीवान विरोधी नारे लगते हुए निकला।  लेकिन किसी में  हिम्मत नहीं हुई  कि कोई उन्हें रोक सके। महिलाओं के जलूस का प्रशासन पर जबरदस्त प्रभाव पड़ा।  १४ नवंबर को  बीकानेर के एक वरिष्ठ अधिकारी विश्वनदास और ओरछा के महाराजा वीरसिंह देव (द्वतीय) जो दतिया आये थे को समझौता कराने तथा  हड़ताल समाप्त कराने के लिए भेजा। ओरछा नरेश को यह मालूम था कि कैम्पबेल ने ऐनुद्दीन को दो महीने के लिए ही रोका था, इसीलिए उन्होंने आमसभा में जनता को यह विश्वास दिलाया कि २ माह के अंदर ऐनुद्दीन चला जाएगा।  लेकिन चिकटे  साहब ने  शांतिपूर्वक आंदोलन चलाने का विश्वास  दिलाते हुए उसे  समाप्त करने में अपनी असमर्थता व्यक्त कर दी।
                  अब आंदोलन का विस्तार तहसील और गाँवों में हो गया था। सरकारी कर्मचारियों के अलावा तहसीलदारों के त्यागपत्र भी आने लगे थे। आंदोलन थमने का नाम नहीं ले रहा था। कैम्पबेल जान गया था कि आंदोलन के सूत्रधार चिकटे साहब हैं, इसीलिए उन्हें  गिरफ्तार कर इंदौर जेल में भेज दिया। चिकटे साहब के गिरफ्तार होने के बाद १५  नवम्बर को  पीताम्बरा पीठ के स्वामी जी महाराज ने पीपुल्स पार्टी के अध्यक्ष का पदभार ग्रहण किया। स्वामी जी के अध्यक्ष बनते ही दतिया की राजनीति में गुणात्मक बदलाव आया।  इसे हम स्वामी जी का प्रभाव अथवा  परिस्थितियों की मजबूरी कह सकते हैं।  अंग्रेज सरकार ने   शीघ्रता से निम्न निर्णय लिए- (१). समस्त राजनीतिक कैदी बिना शर्त रिहा कर दिए गए। (२). प्रशासन के संचालन  के लिए एक गवर्निंग कौंसिल का गठन और (३) दतिया के नए संविधान के निर्माण के लिए आलेख कमेटी के गठन के लिए महाराजा को मजबूर किया।  महाराजा ने समितियों के गठन में आनाकानी की तो रेजिडेंट फिशर ने नए संविधान बनकर लागू होने तक के लिए  महाराजा के  राज्याधिकार समाप्त कर उनके खर्चों को प्रतिबंधित कर दिया। फिशर  के आदेश को राजपरिवार ने अपनी प्रतिष्ठा के प्रतिकूल माना और  प्रतिक्रिया स्वरुप दतिया की महारानी अनशन पर बैठ गईं ।  १८ नवंबर को महिलाओं की एक आमसभा  हुई जिसमें ५००० महिलाओं ने भाग लिया।
                       आंदोलन ने विकराल रूप धारण कर लिया था। ऐसी स्थिति में वाइसराय को हस्तक्षेप करना पड़ा।  उसने मामले को सुलझाने के लिए अपने राजनीतिक सलाहकार को परिस्थितियों का अध्ययन  करने के लिए दतिया भेजा। वाइसराय के सलाहकार की अनुशंसा सकारात्मक थी। चिकटे साहब को गवर्निग कमेटी का अशासकीय सदस्य मनोनीत किया गया। पोलिटिकल एजेंट, रेजिडेंट तथा दीवान के स्थानांतरण के अलावा महाराजा पर लगे प्रतिबन्ध उठा लिए गए।
                     दतिया पीपुल्स पार्टी का उद्देश्य पूरा हो गया था। अब दतिया की जनता के सामने उत्तरदाई शासन प्राप्त करने का लक्ष्य था। प्रजा मंडल का आंदोलन राजनीतिक जागरण एवं देशी रियासतों में गांधी जी के नेतृत्व में चल रहे स्वतंत्र संघर्ष का परिणाम था। अत; २३ नवंबर १९४६ को दतिया पीपुल्स पार्टी का विलय प्रजा  मंडल में हो गया और इस तरह दतिया के जन आंदोलन का प्रथम चरण समाप्त हुआ।
                     

                       
                         
                       
         

         
     
               
                 
                 
                   
                   
                       
                               
                               

                   
  

शुक्रवार, 22 मई 2015

Raja Gobind Singh ka Nishkasan

                                                             दतिया के  राजा गोविन्द सिंह का निष्कासन 

                                                                                                                             -सोम त्रिपाठी 
       
                     एजेंट टू दी गवर्नर-जनरल फॉर सेंट्रल इंडिया  माइकल ओ`द्व्येर ने विदेश सचिव सर हेनरी मैक महोन को नवंबर १९१० में सूचित किया कि उनके पर्यवेक्षण के अधीन देशी रियासत दतिया के २४ वर्षीय महाराजा गोविन्द सिंह के द्वारा अभिप्रेरित दिल को दहलाने वाली १० वीभत्स हत्या-आत्महत्या की घटनाओं का खुलासा हुआ है। (1) आगे यह भी खुलासा हुआ है कि ये निर्मम घटनाएँ न्याय के मौलिक सिद्धांतों के विपरीत हैं। (2) तदनुसार मार्च १९११ में ब्रिटिश सरकार ने  ओ`द्वेर की अनुशंसा को स्वीकारते हुए यह आदेश दिया कि दतिया के अप्रभावी दीवान को बदलकर उसके स्थान पर अधिक प्रशासनिक अधिकार देकर नए दीवान की नियुक्ति की जाये और महाराजा गोबिंद सिंह को यह चेतावनी देकर सूचित किया जाये कि भविष्य में यदि इस तरह की घटनाएँ घटी तो उनके राज्याधिकार छीन लिए जायेंगे।(3) 
                   उपरोक्त घटनाएं  गोबिंद सिंह का  शासन समाप्त करने का पर्याप्त आधार थीं. परन्तु  न्याय के मौलिक सिद्धांतों की  बात करने वाली ब्रिटिश सरकार ने मात्र चेतावनी देकर प्रकरण को बंद कर दिया। यह रियासत की जनता के साथ अन्याय था। इससे एक बात स्पष्ट हो गई कि ब्रिटिश सरकार  अपने लाभ के लिए देशी रियासतों  का उपयोग अपना परोक्ष शासन चलाने  के लिए एक औजार के रूप में करती थी।  उन्हें जनता के हितों से कोई लेना देना नहीं था। देशी रियासतें के ब्रिटिश सरकार से सम्बन्ध उनके द्वारा की गई विभिन्न संधियों पर आधारित थे। इन संधियों में परोक्ष शासन का कोई प्रावधान नहीं था, लेकिन रियासतें  शक्तिहीन होकर पूरी तरह ब्रिटिश सरकार की अनुकम्पा पर निर्भर थीं।  उनमें प्रतिरोध करने की शक्ति न होने के कारण  ऐसी संधियों का कोई महत्व  नहीं था। ब्रिटिश सरकार  ने इस कमजोरी का लाभ उठा कर रियासतों में अपने  दीवान और अन्य प्रशासनिक अधिकारियों की नियुक्ति कर दी थी।
                        कुछ महीने तो सब कुछ ठीक-ठाक चला, लेकिन धीरे-धीरे गोबिंद सिंह पर चेतावनी का असर कम होने लगा। उन्होंने अपना  आचरण सुधारने का जो  वचन दिया था, उससे मुकर गए और  पूर्व की तरह आचरण करने लगे। सितम्बर १९११ में ओ`द्व्येर ने विदेश सचिव को सूचित किया कि गोविन्द सिंह दुष्ट सलाहकारों और नीच साथियों के सम्पर्क में शराबी और ऐयाश हो गए है। खुलेआम उन अधिकारियों  का अपमान कर रहे  हैं,   जिन्हें अभी हाल  में ब्रिटिश सरकार ने दीवान का सहयोग करने के लिए नियुक्त किया था। (4) नौगांव में स्थित पोलिटिकल एजेंट लेफ्टिनेंट कर्नल एल. एम्पेय  ने अक्टूबर १९११ में दतिया का दौरा करने के बाद फर्स्ट  असिस्टेंट एजीजी को सूचित किया कि दशहरा के अवसर पर आयोजित दरबार में महाराजा इतनी शराब पिए हुए थे कि वह बिना सहारे के उठ-बैठ नहीं पा रहे थे। वह और उनके  सहयोगी लगातार प्रशासनिक कार्यों में बाधा डाल रहे थे।  इस दौरन महाराजा स्वयं अपने साथियों को  दीवान के हाथ-पैर तोड़ देने के लिए प्रोत्साहित कर रहे थे। (5) गोविन्द सिंह के लिए यह सब आम-बात थी,लेकिन ब्रिटिश सरकार के द्वारा नियुक्त अधिकारियों और दीवान के  साथ घटित हुई, इसीलिए खास हो गई। ब्रिटिश सरकार ने इसे अपनी प्रभुसत्ता पर अतिक्रमण माना। परिणाम स्वरुप  ओ`द्व्येर ने दिनांक १७ नवंबर १९११ को  आदेश दिया-
                         It has therefore been decided that Your Highness should be immediately relieved from your power and reside outside your state.(6)
                            ब्रिटिश सरकार द्वारा नियुक्त दीवान और अधिकारियों का अपमान कोई इतनी बड़ी घटना नहीं थी कि राज्याधिकार छीन कर गोबिंद सिंह को  राज्य से निष्कासित कर दिया जाये। इसका अन्य रियासतों को गलत संदेश जाता।  इसीलिए ब्रिटिश सरकार ने एक ओर  तो राज्य की जनता को संतुष्ट करने के लिए यह कहा कि गोबिंद सिंह को उनके अत्याचारों के कारण देश-निकाला देकर काले पानी की सजा दी गई है।  वहीँ दूसरी ओर एजीजी ने १७ नवंबर १९११ को गोबिंद सिंह को सूचित किया कि स्थाई रूप से राज्याधिकार छीन कर उन्हें राज्य से निष्कासित करने  का ब्रिटिश सरकार का कोई मंतव्य नहीं है। वह जिस दिन यह  सिद्ध कर देंगे कि वह अपने  उत्तरदायित्वों को निभाने में सक्षम हैं, उस दिन उन्हें दतिया की गद्दी लौटा दी जाएगी।(7) कुछ वर्षों बाद ब्रिटिश सरकार को यह विश्वास हो गया की गोबिंद सिंह के चरित्र में परिवर्तन आ गया तब उन्होंने कुछ प्रतिबंधो  के साथ गद्दी लौटा दी।                         
                             अध्याय का प्रारम्भ  अक्टूबर १९१० के अंतिम सप्ताह में  हुआ था, जब झाँसी के पॉलिटिकल एजेंट फ्रेडरिक मैकडोनाल्ड ने  दतिया का दौरा करने के बाद  एजीजी को उन तमाम वीभत्स घटनाओं की जानकारी  दी जो गोविन्द सिंह के  शासन काल के दौरान घटित हुईं थीं। एजीजी ने गोपनीय डीओ लेटर दिनांक २ नवंबर १९१० के  द्वारा विदेश सचिव को सूचित किया,  तब कहीं जाकर  ब्रिटिश सरकार को इन घटनाओं की जानकारी हुई। गोविन्द सिंह का दतिया में  इतना आतंक था कि  कोई भी व्यक्ति उनके खिलाफ एक भी शब्द  बोलने की हिम्मत नहीं जुटा  सकता था। फ्रेडेरिक मैकडोनाल्ड को भी इसकी जानकारी उनके एक लिपिक ने दी थी। उसने बताया था कि दतिया में  उसके ससुर गोबिंद दास मोदी के परिवार के सारे  सदस्यों ने गोबिंद सिंह के अत्याचारों से प्रेरित होकर हत्या-आत्महत्या कर ली है।  लोक में यह घटना "मोदियों का कटा" के नाम से प्रचिलित है।
              फ्रेडेरिक मैकडोनाल्ड ने घटना का विवरण देते हुए लिखा था कि कुछ दिन पूर्व  दतिया के एक संभ्रांत परिवार को हत्या-आत्महत्या के लिये अप्रत्यक्ष रूप से प्रेरित किया गया था, जिसके सूत्र महाराजा से जुड़े हुए हैं। गोविन्द सिंह ने दरबार के सामानांतर एक अलग से न्यायिक प्राधिकरण बना रखा था जो उनकी मर्जी के अनुसार संचालित होता था, उसे "इजलास-ए-खास" कहते थे। इसमें उन लोगों को अमानुषिक रूप से प्रताड़ित किया जाता था जो महाराज की मर्जी के विरुद्ध काम करते थे या जिन्हें महाराज पसंद नहीं करते थे।   मोदी परिवार के मुखिया गोविन्द दास जो रियासत में महल खर्च के व्यवस्थापक (कामदार) थे, को प्रताड़ित करने के लिए इसी इजिलास-ये-खास में गबन का आरोप लगा कर बंद कर रखा था।  दो दिन  कैद में रखने के  बाद उन्हें सार्वजानिक रूपसे अपमानित करने के उद्देश्य से  हाथ बांध कर क़िले से उनके घर तक प्रदर्शन करते हुए पैदल लाया गया और धमकी दी गई कि  अगर उन्होंने धन नहीं दिया तो उनकी चमड़ी  खीच कर भूसा भर देंगे। उस समय घर पर उनके दो भाई मौजूद थे। जब उन्हें अपने भाई गोबिंद दास मोदी को बाजार में अपमानित करते हुए बांध कर घर लाने  की खबर मिली तो  उन्होंने एक अप्रत्याशित निर्णय ले लिया। उन्होंने अपने  परिवार के सारे सदस्यों को आँगन में एकत्र कर पहले उन्हें मारा और   बाद में  स्वयं आत्महत्या  कर ली। इस कटा में ११ लोग मरे गए थे, जिनमें २ गर्भवती महिलाएं शामिल थी। मात्र  एक १३ वर्षीय लड़का राम चरण जिन्दा बचा था। परीक्षण के दौरान राम चरण ने अपने  बयान  में  कहा था कि उसके एक चाचा कह रहे थे कि पिछले साल  इसी तरह की घटना लिटौरिया परिवार की साथ घटित हुई थी, वैसी  हमारे  परिवार के साथ घटित  न हो। ऐसी स्थिति में हम सब को  जिन्दा रहने  की अपेक्षा मर जाना अच्छा है।(8                        गबन के आरोप के संबंध में मोदी परिवार के वंशज स्व. मन्नू  लाल मोदी ने एक साक्षात्कार में बताया था कि महाराजा गोबिंद सिंह का इतना आतंक था की कोई भी व्यक्ति किसी भी तरह के गबन करने की सोच भी नहीं सकता था। गोबिंद  दास मोदी पर लगाया गया आरोप पूरी तरह झूठा था। वास्तिविकता यह थी कि १८५८ में झाँसी की रानी के पिता मोरोपंत घायल अवस्था में  झाँसी का खजाना लेकर दतिया आये थे जिन्हें हमारे पूर्वज बलदेव मोदी ने अपने बाग़ में शरण दी थी। झाँसी की रानी के मरने के बाद अंग्रेज मोरोपंत को खजाने सहित पकड़ कर झाँसी ले गए थे। महाराजा गोविन्द सिंह को यह शक था कि झाँसी के खजाने का कुछ भाग हमारे परिवार के पास है, जिसे  प्राप्त करने के लिए ही गोबिंद दास मोदी को इजलास-ए-खास में प्रताड़ित और अपमानित किया था।अंतत: हमारे परिवार को  कटा करना पड़ा । 
मोदी परिवार का यह कटा हर तरह से मानवीय  मूल्यों के  परे  अत्यंत वीभत्स था,फिर भी इसे राजनीति से प्रेरित बताया गया। इस प्रकरण में आधिकारिक परिकल्पना यह थी कि (अ)  महाराजा का इतना आतंक था कि लोग बुलावा आने पर उपस्थित होने की अपेक्षा  मर जाना पसंद करते थे। (ब ) कि ये दुर्भाग्यशाली लोग इजलास-ए-खास की प्रताड़ना से इतने डरे हुए थे कि वहां जाने से पहले आत्म-हत्या  कर लेते थे। (9)
                   गहन छानबीन में १९०७ में गद्दी  पर बैठने से लेकर १९११ तक के कार्यकाल में हुईं  संदेहात्मक मौतों की एक लम्बी श्रृंखला का पता चला। कुछ समय पहले अनंत सिंह की  गोविन्द सिंह के शिकार अभियान में निर्ममता से गोली मार कर हत्या करदी गई थी। इस हत्या की कभी पूरी जाँच नहीं हुई। १९०९ में  लिटोरिया परिवार  जिसका जिक्र मोदी के कटा में आया था, के दो भाइयों को इजलास-ए -खास में इतना प्रताड़ित किया कि उनमें से एक भाई की मौत क़िले में ही हो गई थी। इनको भी  गबन का आरोपी बनाया गया था। इसके बाद लिटोरिया परिवार के साथ जो घटित हुआ उसका विवरण अत्यंत वीभत्स है। अगस्त १९०८ में इजलास-ए -खास में बुलाये जाने पर खजांची ने कुएं में गिर कर आत्महत्या कर ली थी। परिस्थिति संदेहास्पद थी परन्तु  इसकी भी कोई जाँच नहीं की गई और उसके कुटुम्बियों ने प्रकट रूप से कहा कि  ऐसा लगता है यह एक दुर्घटना थी । राजमाता के वरिष्ठ सलाहकार दीवान कामता प्रसाद  ने भी नौकरी से निकाले जाने के बाद घर आकर पहले अपनी पत्नी को मारा और बाद में स्वयं आत्महत्या कर ली। आत्महत्या करने के पूर्व वह एक लिखित कथन छोड़ गया था, जिसमें उसने  दीवान पर अभद्र  व्यवहार करने का आरोप लगाया था। दरबार ने यह निष्कर्ष निकला की यह पारिवारिक  झगड़ा था। (10)
                       गोबिंद सिंह के अत्याचारों से दतिया का राज्य और राजधानी भ्रष्टाचार के कारण घृणा का पात्र  बन गई थी।  परिणाम स्वरुप लोग यहाँ से पलायन कर पड़ोस  के राज्यों  में शरण लेने लगे थे। सड़कें सुनसान हो गई थीं और मकान  खँडहर ।  १९०१ से ११ के बीच दतिया की जनसंख्या में भरी कमी आई, प्रत्येक सात में से एक आदमी पलायन कर गया था।  (दतिया स्टेट  गज़ेटियर -पेज ५०)(10)
                   इस प्रकरण में गोविन्द सिंह और उनके अधिकारियों ने जो प्रतिक्रियायें  दी, वह  अपर्याप्त और  अनुपयुक्त सिद्ध हुईं और वे  संदेह के घेरे में आ गए। गोबिंद सिंह जब मैकडोनाल्ड के सामने उपस्थित हुए तब उन्होंने घटना को बड़े हल्के  में लेते हुए कहा था कि अपराधवोध के कारण ये  आत्महत्याएं हुई  थीं। (11) ब्रिटिश सरकार ने गोबिंद सिंह के तर्कों को अमान्य करते हुए उन्हें चेतावनी दी कि भविष्य में यदि इन घटनाओं की पुनरावृति हुई तो उनसे राज्याधिकार छीन लिए जायेंगे।
                    १९११ में दशहरा के अवसर पर आयोजित दरबार में गोबिंद सिंह ने ब्रिटिश सरकार द्वारा नियुक्त अधिकारियों और दीवान  के साथ जो अशिष्ट व्यवहार किया था उसके कारण उन्हें राज्याधिकार छीनकर राज्य से निष्कासित करने की सजा दी गई थी।  गोविन्द सिंह को इसकी  सूचना  नवंबर १९११ के मध्य में दी गई। कोई अप्रिय घटना न घटित हो इसीलिए  कैप्टेन टिंडल के नेतृत्व में सम्मन को तामील कराने के लिए एक सैनिक टुकड़ी भेजी। तमाम  प्रतिरोधों के बाद  २२ दिसम्बर १९११ को कैप्टेन टिंडल दतिया से गोविन्द सिंह को लेकर रवाना हुआ। गोविन्द सिंह को कहां  रखें, यह अभी निश्चित नहीं था, इसीलिए उन्हें सिविल लाइन, बरेली में  एक किराये के मकान में रखा गया।(12)
                         गोविन्द सिंह भाग्यशाली थे कि उनके खिलाफ आरोपों का जो पैमाना निर्धारित किया गया, उसमें वहाली की संभावनाओं को बनाये रखा था। ब्रिटिश सरकार का यह मानना था कि उन्होंने जो कुछ भी किया वह राजनितिक कारणों से नहीं किया,  बल्कि इसका कारण था कि उन्हें न तो राजकाज का प्रशिक्षण मिला  और न पर्याप्त  शिक्षा। अपवाद स्वरुप उन्होंने अल्प समय  इम्पीरियल कैडेट कोर कॉलेज में जरूर व्यतीत किया था, परंतु महल के दूषित  वातावरण के कारण  उनमें जो गलत आदतें पड़ गई  थीं,  उनका चरित्र अत्याधिक उद्दण्ड था। इस सम्बन्ध में ब्रिटिश सरकार यह मत था कि उन्हें इलाज  की जरुरत थी। विचारोपरान्त यह निश्चित हुआ कि  चिकित्सा का यह प्रयोग गोविन्द सिंह की अतिउद्दण्डता के कारण  असफल हो जायेगा इसीलिए उन्हें सेना के कैप्टेन टिंडल के संरक्षण में प्राच्य परंपरा और पश्चिमी आधुनिकता के सिर्फ सही मिश्रण को आत्मसात कराने की परिकल्पना के उद्देश्य से  साउथ अफ्रीका भेजा गया । घोषित रूप में  गोविन्द सिंह की गिरफ्तारी को प्रशिक्षण और उनकी  अफ्रीका यात्रा को  शिकार अभियान का नाम दिया गया। (13) इससे अलग दतिया गजेटियर में गोबिंद सिंह को महिमा मंडित करने के उद्देश्य से उंन्हें  राजस्व प्रशिक्षण के लिए अजमेर भेजने की बात का उल्लेख किया है।
                     मई १९१४ में  अफ्रीका से लौटने के बाद गोविंद सिंह को ब्रिटिश मापदंडों के अनुसार अपने उत्तरदायित्वों के प्रति गंभीर होने के  लिए और उनके मानसिक विकास के लिए जो प्रयास किये गए उसके क्या परिणाम निकले ? इसका अध्ययन  करने के बाद ब्रिटिश अधिकारियों ने कई सुझाव दिए- पोलिटिकल एजेंट, बुन्देलखण्ड ने एजीजी सेंट्रल इंडिया को पत्र दिनांक १७ अप्रैल १९१४ के द्वारा सुझाव दिया कि गोबिंद सिंह ने प्राच्य आचरण सीखने  में कितनी प्रगति की है, को निर्धारित करने के लिए यह आवश्यक है कि परिक्षण के तौर पर उन्हें ७ से १० तक दिन के लिए दतिया भेजा जाए जहां वह कैप्टेन टिंडल के साथ एक अल्प वयस्क महाराजा की तरह रेस्ट हाउस में रहें और बिना हस्तक्षेप के राज्य प्रशासन के क्रियाकलापों का अध्यन करें।(14) लेकिन बिदेश विभाग ने इस प्रस्ताव पर असहमति व्यक्त की कि उनका अपने ही मंत्रियों के अधीन प्रशिक्षण  लेना उचित नहीं है।(15)  एजीजी (अब ओस्वाल्ड बोसांक्वेट थे) ने डिप्टी फॉरेन सेक्रेटरी रोबर्ट हॉलैंड को सूचित किया कि यदि गोबिंद सिंह की नयी रिपोर्ट संतोषजनक आई तो उन्हें जल्दी ही पुन: बहाल कर दिया जाये।बोसांक्वेट  अभी गोबिंद सिंह से मिले नहीं थे क्योंकि उस समय वे अजमेर में रह रहे थे फिर भी अजमेर के पोलिटिकल एजेंट लेफ्टिनेंट कर्नल चार्ल्स प्रिक्त्चार्ड और टिंडल की रिपोर्ट के आधार पर, जिसमें उन्होंने माना था कि यद्यपि गोविन्द सिंह का मानसिक विकास अभी धीमा  और प्रशासकीय प्रशिक्षण  अभी भी अधूरी था, फिर भी उनका विकास संतोषजनक था। इसपर भी  का मानना था कि गोविन्द सिंह को अभी उपयुक्त प्रवीणता प्राप्त करने के लिए  दो या तीन महिने  इंदौर में रह  कर रेजिडेंस कोर्ट्स की कार्यप्रणाली का अध्ध्यन कराना चाहिए। इसके बाद उन्हें दतिया भेजा जाये जहाँ वह दीवान के साथ प्रशासनिक कार्यों का प्रशक्षण लें।(16
                       प्रिटचार्ड ने गोबिंद सिंह की खेल-कूद में पर्याप्त रूचि लेने के आधार पर उन्हें दतिया भेजने की अनुशंसा की थी। ब्रिटिश शासन काल में खेल-कू द पदोन्नति का आधार होता था। यह ख़ुशी की खबर थी कि गोविन्द सिंह पोलो, टेनिस, बैडमिंटन और बिलियर्ड्स आदि खेलों में रूचि लेने लगे थे।  उसी समय समाचार मिला कि गोबिंद सिंह ने एक व्यक्ति को १२,०००/- रुपये दिए और  काम हो जाने पर और देने का वायदा किया।  प्रिटचार्ड ने इस पर प्रतिक्रिया देते हुए कहा कि अजमेर में इस तरह का  दान देना आम बात है। गरीब-नबाज की कब्र के चारों ओर चांदी की जो रैलिंग लगी है उस पर गोबिंद सिंह का नाम लिखा हुआ है, शायद गोबिंद सिंह ने यह रुपया यहाँ दान किया था।(17)
                       गोबिंद सिंह के दतिया लौटने की अंतिम तारीख १ अगस्त १९१४ निर्धारित की गई थी इसीलिए उन्हें अजमेर से इंदौर बुलाया गया।  वह एक सप्ताह बोसंकेट के साथ इंदौर में  रहे और इसके बाद उन्हें कैप्टेन टिंडल के साथ दतिया  भेजा गया। गोबिंद सिंह को हर निर्णय में टिंडल की सलाह मानने के लिए प्रतिबंधित किया गया और कहा गया कि  यदि उन्होंने टिंडल और पोलिटिकल एजेंट की सलाह नहीं मानी तो भविष्य में किसी पूर्वापेक्षा की आवश्यकता नहीं होगी। (18)
                           ३१ जुलाई १९१४ को गोबिंद सिंह दतिया आ गए और  १ अगस्त १९१४ को दतिया में एक दरबार आयोजित किया गया जिसमें पॉलिटिकल एजेंट ने घोषणा की-
                         The Viceroy has been graciously pleased to restore to Your Highness under certain conditions, which have been carefully recorded and explained and willingly accepted by you, the authority and powers of a ruling Chief......I formally place Your Highness in charge of your state subject to those conditions...(19)
                             बोनसँक्वेट की रिपोर्ट असंदिग्ध रूप से आशावादी थी, अत; उसकी रिपोर्ट के आधार पर ब्रिटिश सरकार ने दिसंबर १९१५ में गोबिंद सिंह पर लगे प्रतिबंधों में ढील दे दी इसीलिए  जुलाई १९१५ में कप्तान टिंडल छुट्टी पर चला  गया था,फिर  उसे दतिया नहीं बुलाया गया। ब्रिटिश सरकार को यह विश्वास हो गया  कि अब गोबिंद सिंह के चरित्र  में पर्याप्त सुधार  हो गया है । लेकिन ब्रिटिश सरकार का यह विश्वास अंतिम नहीं हो सका। गोबिंद सिंह ने गद्दी पर बैठते ही जिन  घटनाओं को अंजाम को दिया था, उनकी पुनरावृति भारत के स्वतंत्र होने तक यथावत बनी रहीं। उनके अधिकार  कई बार छीने और लौटाए  गए।    
                       
                 
                           

                               





   
                     
                            

                                                                                                                      

गुरुवार, 8 जनवरी 2015

ulemaon dwara bhai-chare ka katl

  

                                                                                                उलेमाओं द्वारा भाई-चारे का क़त्ल                                                                                                               .-सोम त्रिपाठी 
  
            लोधी सल्तनत में न्याय के श्रोत भ्रष्ट थे।  राजस्व की बसूली बड़ी क्रूरता  से की  जाती थी।  अंग-भंग करना और गुलाम बना कर बाजार में बेच देना आम बात थी, परन्तु फिर भी तुलनात्मक दृष्टि से लोधी सुल्तान अन्य   पूर्ववर्ती मुसलमान सुल्तानों की अपेक्षा थोड़े उदार थे,  इसीलिए उनके  सुदूर इलाकों में हिन्दू और मुसलमानों के बीच  भाई-चारा पल्लवित हो गया था। वे एक दूसरे के त्यौहारों और दुःख दर्द में शामिल होने लगे थे। परन्तु यह भाई-चारा दूर-दराज  के उन इलाकों  में ही पल्ल्वित हुआ था जहाँ हिन्दू  बहुसंख्यक तथा मुसलमान अल्पसंख्यक थे। हम इसे जुल्म और अपमान के साथ समझौता करने की मजबूरी भी कह सकते हैं,पर जो भी हो इस भाई-चारे का विस्तार होना चाहिए था, जो कठमुल्लों और कट्टर पंथियों के कारण नहीं हो पाया।  

             एक बार कनेर कस्बे में हिन्दू और मुसलमान एक दूसरे के धर्म की अच्छाइयों के बारे में चर्चा कर रहे थे, उसी समय लौधान नामक एक ब्राह्मण आया और उसने कहा कि इस्लाम उतना ही महान धर्म है जितना कि हमारा। वहां बैठे हुए सारे लोगों ने लौधान की बात का समर्थन किया और  उसकी प्रसंशा की। लौधान की बात की प्रसंशा  चारों और होने लगी। लखनौती  के उलेमा क़ाज़ी प्यारा और शेख बद्र के कानों में जब यह बात पहुंची तो वो भी प्रसन्न हुए और उन्होंने इसके समर्थन में एक फतवा जारी कर दिया।

                  उस समय सम्भल लोधी सल्तनत का एक सूबा हुआ करता था, जिसका सूबेदार आज़म हुमायुं था। जब उसे  उक्त फतवे की जानकारी हुई तो वह तिलमिला उठा। उसे यह कतई स्वीकार नहीं था कि कोई उसके मजहब की तुलना अन्य मजहब से करे।  उसने सिपाहियों को भेज कर लौधान, क़ाज़ी प्यारा तथा शेख बद्र को पकड़वा  कर बुलवा लिया और इन सब को सुल्तान सिकंदर लोधी के सामने पेश किया जो उस समय सम्भल में ही  मुकाम किये हुए था। सिकंदर लोधी को भी यह स्वीकार नहीं था कि कोई उलेमा इस तरह का फतवा जारी करे अत: उसने  इस तरह के विवादों को हमेशा-हमेशा को समाप्त करने  के लिए सारे सूबों से इस्लाम के उलेमाओं  को बुलवाया।  मुल्ला अब्दुल्ला बल्द मुल्ला इलाहदाद, सैयद मुहम्मद, और मियां कदन देहली से आये।  इसके आलावा आसपास के समस्त मुल्लाओं  और उलेमाओं को भी  संभल में बुलाया।सारे विद्वानों ने गहराई से प्रकरण की छानबीन कर फतवे को निरस्त करते हुए यह निर्णय दिया कि ब्राह्मण लौधान को मुसलमान बना कर कैदखाने में डाल  दिया जाये अथवा क़त्ल कर दिया जावे। लौधान ने मुसलमान होना स्वीकार नहीं किया। परिणामस्वरूप उसका क़त्ल कर दिया गया था। तब से यह एक कानून बन गया और उसका पालन शक्ति के साथ पूरे मुसलिम  काल में हुआ और बाद में इसने आतंकवाद का रूप धारण कर लिया



              उपरोक्त घटना १५०५ की है, क्योंकि जब  इस घटना के बाद सिकंदर लोधी  ३ सफर ९११ हिज़री (५ जुलाई १५०५) को आगरा पहुंचा उसी समय  वहां भयंकर भूकम्प आया था, जिसमें बड़ी-बड़ी इमारतें गिर गई थीं और  पूरा आगरा बरबाद हो गया था। लोगों का विश्वास था कि इतना भयंकर भूकम्प आदम के बाद पहली बार आया है शायद  क़यामत का दिन आ गया है।*

*The History of India, as Told by Its Own Historians. The Muhammadan Period. -Sir H.M.Elliot.Vol. 4 Chep- XXXIII (33) Tarekh-I-Daudi of Abdulla.